Sunday, September 9, 2018

Lo Bachalo Meri Laaj

 ------तर्ज:- नज़्म ------

------ || द्रौपदी की पुकार ||------

लो बचालो मेरी लाज भैया, तेरी बहना लुटी जा रही है,
यह दुशाशन के हाथों कन्हैया मेरी साड़ी खींची जा रही है ||

सभा के मध्य जो गर्दन झुकाए बैठे हैं
माल धन धाम सभी कुछ लुटाये बैठे हैं
जाने ऐसी भी क्या लगन लगी हुयी मेरे पति को
जुए की बाजी में वो हार गए द्रौपदी को
यह न सोचा की अंजाम इसका क्या होगा
सभा में नग्न जो होगी तो उसका क्या होगा
अगरचे आज मेरी आबरू लुट जाएगी
इसकी बदनामी कन्हैया के सर पे आएगी

नीच पापी की नियत में फितूर आया है
तभी तो आज दुशाशन ने जुल्म ढाया है
हमारे स्वामी तो योद्धा हैं शान वाले हैं
क्यों आज इनकी जुबानों पे पड़े ताले हैं
तुम्ही थे मीरा के ह्रदय में समाने वाले
विष के प्याले से थे अमृत को बनाने वाले
भक्त प्रहलाद ने जिस वक्त तुमसे टेर करी
बचाया खंभ से था उस समय न देर करी

खींचते खींचते जिस वक़्त दुशाशन हारा
सोचा द्रौपदी ने की आगया मुरलीवाला
सभा में मान दुशाशन को घटाया तुमने
बचाई लाज को और चीर बढ़ाया तुमने
जिसने विपता में श्री श्याम को पुकारा है
उसने तूफ़ान में भी पा लिया किनारा है
मुरली वाला है, दयालु है, शान वाला है
"पदम्" की वो ही तो बिगड़ी बनाने वाला है

जिसने मोहन का गुणगान गया उसकी बिगड़ी बनी जा रही है 

-: इति :-


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